[नोट: यह लेख विकास और परीक्षण के लिए तैयार की गई प्रायोगिक सामग्री (Fictional Test Content) है।]
दौड़ में आगे निकलना या स्वयं को पाना?
समाज अक्सर सफलता को अंकों, उपाधियों, पद और बैंक बैलेंस से मापता है। किंतु क्या कभी हमने ठहरकर विचार किया कि इन सब को पा लेने के बाद भी मन में जो रिक्तता रह जाती है, उसका उत्तर क्या है?
सच्ची सफलता वह है जो आपके चेहरे पर सहज मुस्कान और हृदय में दूसरों के प्रति करुणा उत्पन्न करे। जब आप किसी असहाय की सहायता करते हैं या किसी के आंसू पोंछते हैं, तब मिलने वाला संतोष किसी भी व्यावसायिक उपलब्धि से कहीं बड़ा होता है।
पाठक टिप्पणियां (9)
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पाठक लॉगिनइतिहास के इस पहलू पर बहुत कम लोगों ने लिखा है। आपके द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रमाण और संदर्भ अत्यंत विश्वसनीय हैं।
राजेश भाई, बिल्कुल सही। जब तक हम स्वयं अपने इतिहास को नहीं पढ़ेंगे, तब तक सच्चाई सामने नहीं आएगी।
जी हां, आने वाले समय में समाज को इस दिशा में और जागरूक होना होगा।
व्यंग्य की धार बहुत पैनी है! पढ़ते-पढ़ते हंसी भी आई और समाज की विद्रूपताओं पर सोचने को भी विवश होना पड़ा।
बिल्कुल सही कहा आपने आलोक जी, मैं भी आपकी टिप्पणी से शत-प्रतिशत सहमत हूं।
सत्य वचन! डॉ. साहब की लेखनी का यही जादू है कि वह पाठक को विचार करने पर मजबूर करती है।
सहमत हूं। नई शिक्षा नीति में मातृभाषा के उपयोग से निश्चित ही विद्यार्थियों की सृजनात्मक क्षमता में वृद्धि होगी।
नेहा जी, आपने बहुत महत्वपूर्ण बिंदु उठाया है। आज मुख्यधारा का मीडिया ऐसे मुद्दों पर मौन रहता है।
जी हां, आने वाले समय में समाज को इस दिशा में और जागरूक होना होगा।