[नोट: यह लेख विकास और परीक्षण के लिए तैयार की गई प्रायोगिक सामग्री (Fictional Test Content) है।]
अनन्या वृद्धाश्रम के अनुभव
जब भी मैं वृद्धाश्रम जाता हूं, वहां बैठी बुजुर्ग माताओं और पिताओं की आंखों में एक मौन प्रतीक्षा दिखाई देती है। वे शिकायत नहीं करते, बस अपने बच्चों की पुरानी तस्वीरों को निहारते रहते हैं जिन्होंने करियर की व्यस्तता के नाम पर उन्हें अलग कर दिया।
संस्कार किताबों से नहीं, आचरण से आते हैं। यदि आज हम अपने बुजुर्गों का आदर नहीं करेंगे, तो आने वाली पीढ़ी से सम्मान की अपेक्षा करना व्यर्थ है।
पाठक टिप्पणियां (9)
इस आलेख पर चर्चा में भाग लेने और टिप्पणी करने के लिए लॉगिन करें।
पाठक लॉगिनव्यंग्य की धार बहुत पैनी है! पढ़ते-पढ़ते हंसी भी आई और समाज की विद्रूपताओं पर सोचने को भी विवश होना पड़ा।
बिल्कुल सही कहा आपने आलोक जी, मैं भी आपकी टिप्पणी से शत-प्रतिशत सहमत हूं।
सत्य वचन! डॉ. साहब की लेखनी का यही जादू है कि वह पाठक को विचार करने पर मजबूर करती है।
सहमत हूं। नई शिक्षा नीति में मातृभाषा के उपयोग से निश्चित ही विद्यार्थियों की सृजनात्मक क्षमता में वृद्धि होगी।
नेहा जी, आपने बहुत महत्वपूर्ण बिंदु उठाया है। आज मुख्यधारा का मीडिया ऐसे मुद्दों पर मौन रहता है।
जी हां, आने वाले समय में समाज को इस दिशा में और जागरूक होना होगा।
डॉ. धीरज जी, बहुत ही सटीक और आंखें खोलने वाला विश्लेषण। आज के दौर में ऐसे निष्पक्ष विचारों की अत्यंत आवश्यकता है।
राजेश भाई, बिल्कुल सही। जब तक हम स्वयं अपने इतिहास को नहीं पढ़ेंगे, तब तक सच्चाई सामने नहीं आएगी।
सत्य वचन! डॉ. साहब की लेखनी का यही जादू है कि वह पाठक को विचार करने पर मजबूर करती है।