कबीर की साखियां और 21वीं सदी के सामाजिक पाखंड
कबीरदास जी के दोहे सदियों पूर्व जितने प्रासंगिक थे, आज धार्मिक और सामाजिक संकीर्णताओं के बीच उससे कहीं अधिक मार्गदर्शक हैं।
कविता, गद्य, लेख संग्रह और साहित्यिक दृष्टिकोण।
कबीरदास जी के दोहे सदियों पूर्व जितने प्रासंगिक थे, आज धार्मिक और सामाजिक संकीर्णताओं के बीच उससे कहीं अधिक मार्गदर्शक हैं।
गोदान और कफ़न जैसी कृतियां आज भी हमें यह सोचने पर विवश करती हैं कि क्या किसानों और वंचितों की स्थिति में बुनियादी परिवर्तन आया है?
इस आलेख में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता "राम की शक्ति पूजा" से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। यह बिंदास धीरज मंच का एक गंभीर एवं विचारोत्तेजक विश्लेषण है।
प्रिंट से डिजिटल स्क्रीन तक की यात्रा में हिंदी भाषा का विस्तार और युवा रचनाकारों की नई शैली का उदय।
"वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर सवेरे, वह प्रदीप जो बुझ जाने को है जीवन के घेरे..." दिनकर के ओजस्वी स्वर की गूंज।