[नोट: यह लेख विकास और परीक्षण के लिए तैयार की गई प्रायोगिक सामग्री (Fictional Test Content) है।]
पत्रकारिता का धर्म
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता और व्यवस्था को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना है। जब पत्रकारिता केवल टीआरपी और क्लिक्स का माध्यम बन जाती है, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होती है। निष्पक्ष और निर्भीक आवाज आज सबसे बड़ी जरूरत है।
पाठक टिप्पणियां (9)
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पाठक लॉगिनव्यंग्य की धार बहुत पैनी है! पढ़ते-पढ़ते हंसी भी आई और समाज की विद्रूपताओं पर सोचने को भी विवश होना पड़ा।
राजेश भाई, बिल्कुल सही। जब तक हम स्वयं अपने इतिहास को नहीं पढ़ेंगे, तब तक सच्चाई सामने नहीं आएगी।
जी हां, आने वाले समय में समाज को इस दिशा में और जागरूक होना होगा।
सहमत हूं। नई शिक्षा नीति में मातृभाषा के उपयोग से निश्चित ही विद्यार्थियों की सृजनात्मक क्षमता में वृद्धि होगी।
बिल्कुल सही कहा आपने आलोक जी, मैं भी आपकी टिप्पणी से शत-प्रतिशत सहमत हूं।
सत्य वचन! डॉ. साहब की लेखनी का यही जादू है कि वह पाठक को विचार करने पर मजबूर करती है।
डॉ. धीरज जी, बहुत ही सटीक और आंखें खोलने वाला विश्लेषण। आज के दौर में ऐसे निष्पक्ष विचारों की अत्यंत आवश्यकता है।
नेहा जी, आपने बहुत महत्वपूर्ण बिंदु उठाया है। आज मुख्यधारा का मीडिया ऐसे मुद्दों पर मौन रहता है।
जी हां, आने वाले समय में समाज को इस दिशा में और जागरूक होना होगा।