किताबों की खुशबू और ई-रीडर का दौर
पीडीएफ और डिजिटल स्क्रीन के युग में कागज पर छपे अक्षरों को उंगलियों से छूने का आनंद क्यों अद्वितीय है?
इतिहास, समाज, साहित्य, समसामयिक राजनीति और जीवन मूल्यों पर गंभीर व बेबाक वैचारिक स्तंभ।
पीडीएफ और डिजिटल स्क्रीन के युग में कागज पर छपे अक्षरों को उंगलियों से छूने का आनंद क्यों अद्वितीय है?
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में ऐसे अनगिनत योद्धा थे जिन्होंने फांसी के फंदे को हंसते-हंसते चूमा, परंतु इतिहास के पन्नों में उन्हें उचित स्थान नहीं मिला।
कबीरदास जी के दोहे सदियों पूर्व जितने प्रासंगिक थे, आज धार्मिक और सामाजिक संकीर्णताओं के बीच उससे कहीं अधिक मार्गदर्शक हैं।
इस आलेख में रानी लक्ष्मीबाई: 1857 की वीरांगना का शौर्य से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। यह बिंदास धीरज मंच का एक गंभीर एवं विचारोत्तेजक विश्लेषण है।
गोदान और कफ़न जैसी कृतियां आज भी हमें यह सोचने पर विवश करती हैं कि क्या किसानों और वंचितों की स्थिति में बुनियादी परिवर्तन आया है?
इस आलेख में युवा पीढ़ी और डिजिटल लत से मुक्ति का मार्ग से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। यह बिंदास धीरज मंच का एक गंभीर एवं विचारोत्तेजक विश्लेषण है।
तीन विशाल पुस्तकालय—रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक—जब महीनों तक जलते रहे, तो मानवता ने ज्ञान की कितनी बड़ी धरोहर खो दी?
इस आलेख में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता "राम की शक्ति पूजा" से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। यह बिंदास धीरज मंच का एक गंभीर एवं विचारोत्तेजक विश्लेषण है।
सिनेमा में इतिहास का प्रस्तुतीकरण जब व्यावसायिक लाभ के लिए तथ्यों को विकृत करने लगे, तो जनमानस पर उसका क्या प्रभाव पड़ता है?
इस आलेख में महान मराठा साम्राज्य और नौसेना का स्वर्णिम युग से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। यह बिंदास धीरज मंच का एक गंभीर एवं विचारोत्तेजक विश्लेषण है।
प्रिंट से डिजिटल स्क्रीन तक की यात्रा में हिंदी भाषा का विस्तार और युवा रचनाकारों की नई शैली का उदय।
"वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर सवेरे, वह प्रदीप जो बुझ जाने को है जीवन के घेरे..." दिनकर के ओजस्वी स्वर की गूंज।